Tuesday, February 17, 2009

क्यूँ ...

क्यूँ आज भी मेरी साँसों से एक ही नाम गुजरता है ...

क्यूँ आज भी ये दिल शामों के लिए मचलता है ...

क्यूँ आज भी वो हँसी मेरे कानो में गूंजती है ...

क्यूँ आज भी उन खतों में वही मीठी खुशबू आती है ...

क्यूँ आज भी वो एहसास मेरे ज़ेहन में रहता है ...

क्यूँ आज भी वो एक ख़याल मुझ में हलचल मचाता है ...

क्यूँ आज भी ये मन उस एक आवाज़ को तरसता है ...

क्यूँ आज भी ये आँखें उस एक चेहरे को तलाशती है ...

क्यूँ आज भी दिल उन अधूरे सपनो को थामे है ...

क्यूँ आज भी ये दिल एक आस बांधे बैठे है ...

क्यूँ आज भी भीड़ में ख़ुद को अकेला पाती हूँ ...

क्यूँ आज भी रात के अंधेरे में चुपचाप आंसू बहाती हूँ ...

बस अब बहुत हुआ पागलपन ...

यही सोच के हर बार मैं कोशिश करती हूँ भुलाने की ...

हर उस एहसास को जो मुझे तुमसे जोड़ता है ...

हर उस ख्याल को जो ताज़ा करता है उन यादों को ...

हर उस बात को जो तुम्हारी याद दिलाती है ...

हर उस सपने को जो बुने थे इस पागलपन में ...

पर क्या करूँ ...

ख़ुद से अलग करने की कोशिश में तुम्हे और भी करीब पाती हूँ ...

जिनको भुलाने का सोचा था उन ख्यालों में उलझ सी जाती हूँ ...

जिंदगी की इस दौड़ में ख़ुद को ढूद्ती फ़िर रही हूँ ...

पर शायद वो भी मुमकिन नही लगता जब ख़ुद को ही भूल चुकी हूँ ...

1 comment:

Rajeev P said...

Good one MS... it seems you are missing him a lot ..:)